बुशर्ट की पाकिट की जद में
सुप्रसिद्ध कवि व लोकगीत गायक दिनेश तिवारी भोजपुरिया के कलम से

बुशर्ट की पाकिट की जद में
कागजों के बीच रहने वाला चांद,
वक्त के साथ सरक आता है पर्स के भीतरी हिस्से में पलास्टिक वाले फ्रेम के बीच
जिसे एक दिन मार लेता है
वक्त का पाकिटमार.
कटे जेब को लेकर
अपनी चांद को ढूंढने वाले
को जब मिलता है तुड़ा- मुड़ा पर्स,
फेंके गए कुछ दूर कागज
जिसमें आखिरकार
मिल ही जाता है घिसड़ा – मिसुड़ा चांद.
जिसे भर मुट्ठा हाथ से जकड़ कर,
फ़टी जेब की ओर निहार कर
फिर से तुड़े- मुड़े पर्स में रखकर
आगे बढ़ जाने को ही
रोटी की तलाश कहते हैं.
सच में प्रेम भी रोटी की
ही तरह फूलता – पचकता,
सिकुड़ता और सूखता भी है.
मैं
बिल्कुल चांद के ही माफ़िक
अपने प्रेम को
रोटी जैसा ही चाहता हूं
ताकि भूख और प्रेम
के बीच संतुलन बना रहे
जैसे चांद के साथ तारों का.
मुझे रोटी के धब्बे से
चांद के धब्बे थोड़े से
भी इतर नही लगते.
सच में नही लगते..
काश! किसी दिन ऐ मेरे चांद
तुम मुझे रोटी की ही तरह
मिलते….।।दिनेश कुमार तिवारी
भोजपुरिया





