अज्ञेय ने भारतीय परम्परा को यूरोपीय आधुनिकता के साथ जोड़कर किया प्रस्तुत
(आलोक कुमार तिवारी)

अज्ञेय ने भारतीय परम्परा को यूरोपीय आधुनिकता के साथ जोड़कर किया प्रस्तुत
कुशीनगर । बड़ा कवि अपने समय और उस समय की समझ का अतिक्रमण करता है। अपने समय की समझ का अतिक्रमण करने वालों को उनका समय ठीक से नहीं पहचान पाता उनकी पहचान बाद में होती है। निराला और अज्ञेय इसी तरह के रचनाकार थे। उनके बड़ा होने की पहचान उनके दिवंगत होने के बाद हुई। अज्ञेय को भारत की परम्परा का नहीं, परंपराओं का बोध था। उक्त बातें उक्त बातें कलावती देवी स्मृति न्यास द्वारा “अज्ञेय स्मृति सम्मान” से सम्मानित होने के बाद स्वीकृति वक्तव्य में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति ने कही। वे बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ भारतीय साहित्य संस्थान न्यास समिति (ट्रस्ट), श्रद्धानिधि न्यास, विद्याश्री न्यास, कलावती देवी स्मृति न्यास द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही। उन्होंने कहा कि अज्ञेय को अपने आरंभिक जीवन में मैं भी नहीं समझ पाया। आज उनके नाम से दिए जा रहे सम्मान को पाकर गर्व का अनुभव करता हूं। उन्होंने कहा कि अज्ञेय प्रकृति प्रेम की कविता करने वाले आधुनिक हिंदी के सबसे बड़े कवि थे। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर अनंत मिश्र ने कहा कि अज्ञेय को भारतीय परम्परा का इतना गहरा ज्ञान था कि उन्हें धीरे धीरे पढ़कर ही जाना जा सकता है। किसी गहरे ज्ञान को धीरे धीरे पढ़कर ही जाना जा सकता है। उन्होंने भारतीय परम्परा को यूरोपीय आधुनिकता के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो महेश्वर मिश्र ने ज्ञानेंद्रपति के साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डाला और हिंदी साहित्य के लिए अज्ञेय के योगदान पर चर्चा की। प्रो परितोष मणि ने स्वागत वक्तव्य देते हुए कलावती देवी न्यास द्वारा के साहित्यिक प्रयासों पर प्रकाश डाला। महाविद्यालय के सचिव वीरेंद्र सिंह अहलूवालिया ने भी संगोष्ठी को संबोधित किया। प्रो प्रकाश उदय ने आभार ज्ञापन किया। संयोजन और संचालन प्रो गौरव तिवारी ने किया। संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘अज्ञेय के निबंध’ पर चर्चा करते हुए प्रो० रामसुधार सिंह ने उनके निबंध संग्रह कुट्टीचाटन की भूमिका की चर्चा की। प्रो परितोष मणि ने कहा कि कलाओं की आवाजाही के बीच पुल बनाने का कार्य करते हुए परंपरा को आधुनिकता से जोड़ते हैं। डॉ अखिल मिश्र ने कहा कि अज्ञेय के निबंध मानव ही नहीं प्रकृति की भी स्वतंत्रता की चिंता से भरे हैं। संचालन डॉ० आशुतोष तिवारी ने किया। तीसरे सत्र में ‘काव्य-संध्या’ आयोजित हुई जिसमें अध्यक्षता वरिष्ठ कवि गिरिधर करुण ने की इंद्र कुमार दीक्षित, सरोज पाण्डेय, उद्भव मिश्र, दिनेश तिवारी आदि ने कविता पाठ किया। गौरव तिवारी ने अज्ञेय स्मृति उपवन में अज्ञेय की कविता का पाठ किया। कार्यक्रम में दयानिधि मिश्र, आनन्द मणि, डॉ सुधाकर तिवारी, डॉ गिरिजेश मिश्र, डॉ संजय गुप्त, डॉ सत्येंद्र गौतम, डॉ निगम मौर्य, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शम्भू दयाल कुशवाहा, डॉ राकेश चतुर्वेदी, आनन्द मणि त्रिपाठी, अभिलाषा मिश्र, शिखा सिंह, विजय सेन सिंह, अशोक मद्धेशिया आदि सहित साहित्य सुधीजन और विद्यार्थी उपस्थित रहे।





