उत्तरप्रदेशकुशीनगरदेशसाहित्य सृजन
सफल वयोवृद्धता के लिए मूल्यों के परिवर्तन को स्वीकार करने की क्षमता को धारण करना है आवश्यक
(1) सफलता के स्थान पर जीवन की सार्थकता और चरितार्थता महत्त्वपूर्ण : प्रोफेसर रजवंत राव (2) उम्र का बढ़ना अनिवार्यता है लेकिन लेकिन बूढ़ा होना विकल्प है : प्रो चंद्रप्रकाश मणि त्रिपाठी (3) विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में सफल वयोवृद्धता से संबद्ध समस्याओं और उनके समाधान पर हो रहे हैं निरंतर शोधकार्य: प्रो धनन्जय कुमार (4) वयोवृद्धता मानसिक स्थिति है जिसे मन से स्वीकार करने से आ जाती है वृद्धता : भन्ते नन्दरतन

सफल वयोवृद्धता के लिए मूल्यों के परिवर्तन को स्वीकार करने की क्षमता को धारण करना है आवश्यक

(1) सफलता के स्थान पर जीवन की सार्थकता और चरितार्थता महत्त्वपूर्ण : प्रोफेसर रजवंत राव
(2) उम्र का बढ़ना अनिवार्यता है लेकिन लेकिन बूढ़ा होना विकल्प है : प्रो चंद्रप्रकाश मणि त्रिपाठी
(3) विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में सफल वयोवृद्धता से संबद्ध समस्याओं और उनके समाधान पर हो रहे हैं निरंतर शोधकार्य: प्रो धनन्जय कुमार
(4) वयोवृद्धता मानसिक स्थिति है जिसे मन से स्वीकार करने से आ जाती है वृद्धता : भन्ते नन्दरतन
कुशीनगर । हमने जिस सफलता को आज मूल्य बना दिया है, वह बाजार के अनुरूप विमर्श के केंद्र में है। सफलता के स्थान पर जीवन की सार्थकता और चरितार्थता को केंद्र में रखना चाहिए जिसमें सुख, संतोष और सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में स्वयं को नियोजित करना महत्त्वपूर्ण हो। अपनी और अपने संततियाँ की आर्थिक समृद्धि के लिए चिंतित रहना ही एकमात्र लक्ष्य नहीं होना चाहिए। दुनिया का बहुत बड़ा आकर्षण त्याग या छोड़ना है जिसे उम्रसिद्धता भी कहते हैं। बुद्ध की भांति जब हम अंतर्दृष्टि बहिर्लक्षी होते हैं तब ही हमारी वास्तविक सफलता होती है। उक्त बातें आईसीएसएसआर- एनआरसी द्वारा प्रायोजित बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के मनोविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित ‘सफल वयोवृद्धता : मुद्दे और चुनौतियां’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह के मुख्य अतिथि दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के कला संकाय के अधिष्ठाता प्रोफेसर रजवंत राव ने बुधवार को कहा। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्य, तार्किकता और सामाजिक मूल्य उच्च शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य होते हैं। इतिहास और मनोविज्ञान के संबंध को रेखांकित करते हुए प्रोफेसर राव ने होमो सेपियंस और मानव चेतना के ऐतिहासिक विकास क्रम पर प्रकाश डालते हुए प्राचीन फारसी भाषा के शब्द बज्रक से बुजुर्ग शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए उसके अर्थ अनुभव के महत्त्व की चर्चा की। उन्होंने कहा कि सामयिक संदर्भों के अनुरूप सामाजिक दायित्वों के निर्वाह हेतु सफल वयोवृद्धता जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा होना अत्यंत आवश्यक है। सबसे बड़ी समस्या हर युग समय के मूल्यों के बदलाव को लेकर है।
हर युग के अपने अपने प्रश्न होते हैं। उन प्रश्नों का उत्तर देने हेतु ही अलग अलग धर्म और विचार आते रहते हैं। मनुष्य एक समय में एक सिद्धांत बनाता है और बदलते समय के साथ समस्याएं बदल जाती हैं। इसीलिए दुनिया के तमाम सिद्धांत नई समस्याओं के लिए अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। वर्तमान समस्या के मूल में इस युग की केंद्रीय चेतना बाजार और अर्थव्यवस्था है। जिसके कुप्रभावों से जितना बचा जा सके, उतना बेहतर है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर धनंजय कुमार ने कहा कि सफल वयोवृद्धता के विषय में हमारे प्राचीन ग्रंथों में नारद और सनत्कुमार के संवाद में सम्पूर्ण मानव जीवन के प्रसन्न रहने की आश्वस्ति विषयक चर्चा का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में सफल वयोवृद्धता से संबद्ध समस्याओं और उनके समाधान पर निरंतर शोधकार्य हो रहे हैं। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ भंते नंदरतन ने वयोवृद्धता और मनोविज्ञान के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में मनोवैज्ञानिक प्रविधियाँ का अत्यंत महत्व है। धम्म पद में मन की चर्चा आती है। अभिधम्म पिटक में मन को अग्रगामी और सभी कार्यों के संपादन का मूल माना गया है। मन अत्यंत चंचल है अतः इसका निग्रह अत्यंत कठिन कार्य है। जब हम अपने समस्त कार्यों को मन से करते हैं तो प्रसन्नता अनपायिनी छाया के रूप में सर्वदा हमारे साथ विद्यमान रहती है। मनुष्य को छोड़कर सभी प्राणी मन के अधीन रहते हैं। हमारी समस्त इंद्रियां मन के अनुसार ही कार्य करती हैं। मन को समझने का प्रयास मनोविज्ञान का कार्य है। अतः संसार के सभी विषयों का सम्बन्ध मनोविज्ञान से है। ऐसे ही वयोवृद्धता मानसिक स्थिति है जिसे मन से स्वीकार करने से वृद्धता आ जाती है। उन्होंने मिर्च का उदाहरण देते हुए कहा कि पकने की स्थिति के बाद भी उसका तीखापन बना रहता है। उन्होंने मन से हम स्वयं को वृद्ध अनुभव न करें, ऐसा प्रयास करने पर बल दिया। संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर चंद्रप्रकाश मणि त्रिपाठी ने एक अंग्रेजी वाक्य को उद्धृत करते हुए कहा कि आयु का बढ़ना अनिवार्यता है किन्तु वृद्ध होना वैकल्पिक है अर्थात वृद्धता अनुभूति का विषय है। जीवन के विभिन्न जैविक अवस्थाओं को निरूपित करते हुए उन्होंने बताया कि 70 से 79 वर्ष की अवस्था में विविध शारीरिक अवयवों की क्षमता में क्षरण होता है। बढ़ती आयु की सफलता के निर्धारक मानकों और समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि वयोवृद्धता की समस्याओं का समाधान सकारात्मक सोच, दूसरों के प्रति सद्भाव और अच्छे कर्मों में निहित है। अच्छी पुस्तकों से बढ़िया कोई मित्र नहीं होता है। जिनके पास अच्छी किताबें हैं, उनके पास समय नहीं कटने की समस्या नहीं रहती। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर उन्हें याद किया। संगोष्ठी को प्रोफेसर रामजी लाल और राकेश जायसवाल ने भी संबोधित किया। इससे पूर्व समापन सत्र में अतिथियों का स्वागत वक्तव्य महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर विनोद मोहन मिश्र ने प्रस्तुत किया। कहा कि यह संगोष्ठी युवा पीढ़ी के लिए बहुत लाभदायक होगा। वयोवृद्धता के लिए शोध की नए आयाम स्थापित करने में सहायक होगा। आयोजन सचिव प्रोफेसर सीमा त्रिपाठी ने दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित सत्रों, महत्वपूर्ण व्याख्यानों एवं शोधपत्र वाचन सहित अन्य गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर अमृतांशु शुक्ल ने किया। आभार ज्ञापन डॉ रीना मालवीय ने किया। समापन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोकीनाथ श्रीवास्तव का सम्मान किया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर रामभूषण मिश्र, डॉ सत्यप्रकाश, डॉ वीरेंद्र साहू, विशेषता मिश्रा, प्रोफेसर रवि प्रताप पाण्डेय, प्रोफेसर गौरव तिवारी, डॉ निगम मौर्य, डॉ शैलेंद्र राव, डॉ अशोक सिंह, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ बिनोद सिंह व शिक्षक, कर्मचारी एवं छात्र छात्राओं की उपस्थिति रही।
हर युग के अपने अपने प्रश्न होते हैं। उन प्रश्नों का उत्तर देने हेतु ही अलग अलग धर्म और विचार आते रहते हैं। मनुष्य एक समय में एक सिद्धांत बनाता है और बदलते समय के साथ समस्याएं बदल जाती हैं। इसीलिए दुनिया के तमाम सिद्धांत नई समस्याओं के लिए अपर्याप्त प्रतीत होते हैं। वर्तमान समस्या के मूल में इस युग की केंद्रीय चेतना बाजार और अर्थव्यवस्था है। जिसके कुप्रभावों से जितना बचा जा सके, उतना बेहतर है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर धनंजय कुमार ने कहा कि सफल वयोवृद्धता के विषय में हमारे प्राचीन ग्रंथों में नारद और सनत्कुमार के संवाद में सम्पूर्ण मानव जीवन के प्रसन्न रहने की आश्वस्ति विषयक चर्चा का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में सफल वयोवृद्धता से संबद्ध समस्याओं और उनके समाधान पर निरंतर शोधकार्य हो रहे हैं। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए डॉ भंते नंदरतन ने वयोवृद्धता और मनोविज्ञान के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में मनोवैज्ञानिक प्रविधियाँ का अत्यंत महत्व है। धम्म पद में मन की चर्चा आती है। अभिधम्म पिटक में मन को अग्रगामी और सभी कार्यों के संपादन का मूल माना गया है। मन अत्यंत चंचल है अतः इसका निग्रह अत्यंत कठिन कार्य है। जब हम अपने समस्त कार्यों को मन से करते हैं तो प्रसन्नता अनपायिनी छाया के रूप में सर्वदा हमारे साथ विद्यमान रहती है। मनुष्य को छोड़कर सभी प्राणी मन के अधीन रहते हैं। हमारी समस्त इंद्रियां मन के अनुसार ही कार्य करती हैं। मन को समझने का प्रयास मनोविज्ञान का कार्य है। अतः संसार के सभी विषयों का सम्बन्ध मनोविज्ञान से है। ऐसे ही वयोवृद्धता मानसिक स्थिति है जिसे मन से स्वीकार करने से वृद्धता आ जाती है। उन्होंने मिर्च का उदाहरण देते हुए कहा कि पकने की स्थिति के बाद भी उसका तीखापन बना रहता है। उन्होंने मन से हम स्वयं को वृद्ध अनुभव न करें, ऐसा प्रयास करने पर बल दिया। संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर चंद्रप्रकाश मणि त्रिपाठी ने एक अंग्रेजी वाक्य को उद्धृत करते हुए कहा कि आयु का बढ़ना अनिवार्यता है किन्तु वृद्ध होना वैकल्पिक है अर्थात वृद्धता अनुभूति का विषय है। जीवन के विभिन्न जैविक अवस्थाओं को निरूपित करते हुए उन्होंने बताया कि 70 से 79 वर्ष की अवस्था में विविध शारीरिक अवयवों की क्षमता में क्षरण होता है। बढ़ती आयु की सफलता के निर्धारक मानकों और समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि वयोवृद्धता की समस्याओं का समाधान सकारात्मक सोच, दूसरों के प्रति सद्भाव और अच्छे कर्मों में निहित है। अच्छी पुस्तकों से बढ़िया कोई मित्र नहीं होता है। जिनके पास अच्छी किताबें हैं, उनके पास समय नहीं कटने की समस्या नहीं रहती। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर उन्हें याद किया। संगोष्ठी को प्रोफेसर रामजी लाल और राकेश जायसवाल ने भी संबोधित किया। इससे पूर्व समापन सत्र में अतिथियों का स्वागत वक्तव्य महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर विनोद मोहन मिश्र ने प्रस्तुत किया। कहा कि यह संगोष्ठी युवा पीढ़ी के लिए बहुत लाभदायक होगा। वयोवृद्धता के लिए शोध की नए आयाम स्थापित करने में सहायक होगा। आयोजन सचिव प्रोफेसर सीमा त्रिपाठी ने दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित सत्रों, महत्वपूर्ण व्याख्यानों एवं शोधपत्र वाचन सहित अन्य गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर अमृतांशु शुक्ल ने किया। आभार ज्ञापन डॉ रीना मालवीय ने किया। समापन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोकीनाथ श्रीवास्तव का सम्मान किया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर रामभूषण मिश्र, डॉ सत्यप्रकाश, डॉ वीरेंद्र साहू, विशेषता मिश्रा, प्रोफेसर रवि प्रताप पाण्डेय, प्रोफेसर गौरव तिवारी, डॉ निगम मौर्य, डॉ शैलेंद्र राव, डॉ अशोक सिंह, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ बिनोद सिंह व शिक्षक, कर्मचारी एवं छात्र छात्राओं की उपस्थिति रही।






बहुत सुन्दर रिपोर्टिंग। हार्दिक बधाई।