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विश्व भोजपुरी संगठन के कर्मठ कार्यकर्ता अरुणेश नीरन नहीं रहे

(आलोक कुमार तिवारी)

विश्व भोजपुरी संगठन के कर्मठ कार्यकर्ता अरुणेश नीरन नहीं रहे

कुशीनगर । हिन्दी और भोजपुरी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान डॉ अरुणेश नीरन नहीं रहे। मंगलवार रात्रि लगभग 10 बजे उन्होंने गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 80 वर्षीय डॉक्टर नीरन बैक्टिरियल और फंगल इन्फेक्शन से पीड़ित थे। साहित्यकार शिवप्रसाद सिंह पर महत्वपूर्ण शोध कार्य करने वाले नीरन जी ने भोजपूरी की भी खूब सेवा की। वे लंबे समय तक “विश्व भोजपुरी संगठन” के अंतरराष्ट्रीय महासचिव रहे। इस रूप में उनकी भूमिका ऐतिहासिक महत्व की रही है। उन्होंने ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ जैसी त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। आपने कुशीनगर स्थित बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी के आचार्य, अध्यक्ष और प्राचार्य के रूप में 17 दिसंबर 2007 से 19 जून 2008 तक सेवा दिया। अपने विद्यार्थियों में लोकप्रिय अध्यापक के रूप में प्रतिष्ठित नीरन जी को साहित्यिक समारोहों के बड़े आयोजक के रूप में भी जाना जाता है। वे सिर्फ लेखक और संपादक ही नहीं, संस्कृतिकर्मी भी थे। पिछले दो वर्षों से उन्होंने ‘अज्ञेय स्मृति सम्मान’ भी शुरू किया था जो 2024 में अरुण कमल और 2025 में उदय प्रकाश को मिला। उनके निधन पर बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राचार्य प्रो विनोद मोहन मिश्र की अध्यक्षता में शोक सभा का आयोजन किया गया। शोक सभा को सम्बोधित करते हुए प्राचार्य मिश्र ने कहा कि हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, प्रखर चिंतक, सृजनशील लेखक एवं महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. अरुणेश कुमार मणि नीरन जी ने अपने दीर्घ शिक्षकीय जीवन में न केवल विद्यार्थियों के बौद्धिक और नैतिक निर्माण में विशिष्ट योगदान दिया, बल्कि हिंदी साहित्य और शिक्षाजगत में अपनी विद्वत्ता, संवेदनशीलता और रचनात्मक दृष्टिकोण से अमिट छाप छोड़ी। वे अनुशासन, मूल्यबोध एवं मानवीय गरिमा के जीवंत उदाहरण रहे हैं। उनका निधन महाविद्यालय परिवार की एक अपूरणीय क्षति है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। हिंदी विभाग के प्रोफेसर गौरव तिवारी ने कहा कि नीरन जी स्वाभाविक रूप से अभिभावक थे। अभिभावकत्व उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी। उनका स्नेह और मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहता था। उनका महाप्रयाण एक बहुत बड़ी रिक्ति पैदा कर गया है। उनका व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। वे सदैव रचनात्मक रहने, पढ़ने – लिखने और बड़ा करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। इस दौरान प्रो रामभूषण मिश्र, प्रो इंद्रासन प्रसाद प्रो रवि प्रताप पाण्डेय, प्रो बीरेंद्र कुमार, प्रो राजेश कुमार सिंह, डॉ दीपक, डॉ रामनवल, डॉ आशुतोष तिवारी, प्रो अवधेश पांडेय , प्रो ज्ञान प्रकाश मंगलम, प्रो कौस्तुभ नारायण मिश्र , डॉ रमेश चंद्र विश्वकर्मा, डॉ निगम मौर्य, डॉ कृष्ण कुमार जायसवाल, डॉ त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ निरंकार राम त्रिपाठी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ सुबोध गौतम, डॉ पंकज दुबे, डॉ यज्ञेश नाथ त्रिपाठी, डॉ कमाल हसन, दुर्गा द्विवेदी सहित महाविद्यालय के शिक्षकों कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने भाग लिया।

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