
जन्म के पश्चात
रुदन
और
हूं – हां के बाद
पहिले शब्द
जो निकलते हैं
मुंह से
बुऊऊऊ,
आऽबुऊऊऊऊ
बुऊऊऊऊ,
बू, बू के रास्ते
पहुंचते हैं
‘ बुआ ‘ तक।
अपने कुंवारेपन में
बुआ होने का भाव
मां के होने से कम नहीं होता।
बुआ
नहीं पालती,
भतीजे या भतीजी ;
पालती है,
वह पीढ़ी
जिसके होने से
बना रहेगा रास्ता
अपनी मिट्टी, घर और खलिहान तक।
बुआ होने का सुख
मां- बाप और भैया- भाभी;
उनके भी, जो मानते हों,
पट्टीदार या गोतिया या ऐसा ही कुछ
– के सुरक्षित भविष्य के सपने का सुख है।
बुआ होना
पराए होने
या कर दिए जाने
के बाद भी,
घर के बने होने का गुरूर है।
बुआ होना,
अपने ही घर में
पराए कर दिए जाने की,
पीड़ा है।
बुआ होना,
अपने घर से
उस स्नेह की तलाश है जो
समय की अंधड़ में
खो गया है।
बुआ होना
अपने हिस्से के सम्मान की
न समझे जाने वाली त्रासदी है।
बुआ होना
उस मां का होना है
जो मां के सम्मान को न पाकर भी
ममता की स्रोत है।
बुआ का होना
उस रिश्ते का होना है
जिसकी प्रार्थनाओं और दुआओं में
बिना किसी स्वार्थ के
एक रिश्ता पलता है
ताउम्र।
लेखक: डॉ गौरव तिवारी





